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Mahatma Gandhi

27 जनवरी 1948 की सुबह कत्ल किये जाने के ठीक 3 दिन पहले गांधी जी दिल्ली के महरौली में हज़रत बख्तियार काकी रहमतुल्लाह एलैह के दरगाह पहुंचे थे। ये दरगाह कुतुबमीनार के क़रीब है आख़री मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफर ने बख्तियार काकी रहमतुल्लाह एलैह के बगल में दफन होने की वसीयत की थी जो उनको नसीब नही हुई इस दरगाह को 1948 दंगे में दंगाइयों ने काफी नुकसान पहुँचाया था।दंगे की वजह से मुसलमान यहां से पलायन कर रहे थे। गांधी जी दंगो को शांत कराने और मुसलमानों को भरोसा दिलाने गए थे कि आप कही मत जाएं सबकुछ पहले की तरह हो जाएगा दरगाह की दोबारा मरम्मत कराई जाएगी जिसको लेकर गांधी जी भूख हड़ताल पर भी बैठे। लेकिन बावजूद मुसलमान पलायन कर चुके थे मुस्लिम बहुल आबादी वाले मेहरौली में अब मुसलमान कम, ऐतिहासिक मक़बरे और मस्ज़िदे ज़्यादा है। दर्ज़नों मस्ज़िदें वीरान पड़ी है।

पहली तस्वीर गांधी जी के क़त्ल के तीन दिन पहले की। दंगाइयों ने महरौली में हज़रत बख्तियार काकी रहमतुल्लाह एलैह के दरगाह में तोड़ फोड़ की और एक हिस्से में आग लगा दी थी। डर की वजह से लाखों मुसलमान पलायन कर रहे थे गांधी जी उन्हें समझाने पहुचे थे। अपनी ज़मीन अपना घर छोड़कर कहीं ना जाएं सबकुछ ठीक हो जाएगा।

लेकिन कुछ भी ठीक नही हुआ। ना तो महरौली में मुसलमान रहे और ना ही गांधी जी तीन दिन बाद 30 जनवरी 1948 को गांधी जी का क़त्ल कर दिया गया।

हिंदूवादी संगठन हमेशा से आतंकी गोडसे का बचाव करते आए हैं तर्क देते है की गांधी ने देश का बंटवारा कराया था इसलिए गोडसे ने मारा। इनसे कोई पूछे की 1946 और 1944 में गोडसे ने गांधी पर चाकू से जानलेवा हमला किया तब कौन सा बंटवारा हुआ था?

हत्या के बाद गृह मंत्री सरदार पटेल ने गोलवलकर को लिखे एक पत्र में साफ तौर पर कहा था कि ‘उनके सभी भाषण सांप्रदायिक जहर से भरे थे। इस जहर के परिणामस्वरुप देश को गांधीजी के प्राणों की क्षति उठानी पड़ी और कुछ हिंदूवादी संगठन के लोगों ने गांधीजी की मृत्यु के बाद खुशी जाहिर की और मिठाइयां बांटीं।

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Savitri Bai Phule

3 जनवरी आज महान समाज सुधारिका सावित्री बाई फुले की जयंती है उनकी जयंती पर उन्हें खूब याद किया जा रहा है ट्विटर पर ट्रेन्ड भी हो रहा है लेकिन किसी भी बड़े नेता ने फ़ातिमा शेख़ का जिक्र करना मुनासिब नही समझा, आज उस फातिमा शेख को भूल गए जिसके बिना सावित्री बाई फुले का मिशन अधूरा था।

जब सावित्री बाई फुले ने दलितों और महिलाओं की शिक्षा का मिशन शुरू किया तो उनके जाती वालो ने ही उनका विरोध किया उनके घर वालो ने ही उनका घर खाली करा दिया दलितों को शिक्षित करने के जुर्म में समाज से बाहर कर दिया था।

जब पूरे पुणे में किसी ने जगह नही दी तो उस मुश्किल वक़्त में फ़ातिमा शेख और उनके भाई उस्मान शेख ने उन्हें रहने के लिए जगह दी और 1848 में देश का पहला महिला विद्यालय खोलने के लिए जमीन दी और खुद सावित्री बाई के साथ दलितों और महिलाओं को पढ़ाना शुरू किया जिसके वजह से उन्हें भी समाज के ताने सुनने पड़े।

आज भी लड़कियों को ज़्यादा नही पढ़ाया जाता आज से क़रीब 170 साल पहले महिलाओं को स्कूल कॉलेज़ से जोड़ना बहुत बड़ी बात थी। समाज की परवाह किये बेगैर इन दोनों महान हस्तियों ने ये काम को कर दिखाया जब लड़कियों को घर से अकेले निकलने की भी इजाज़त नही थी पढ़ाना तो दूर की बात उस वक़्त फ़ातिमा शेख़ ने सावित्री के साथ महिलाओं को शिक्षा से जोड़ा। पर अफसोस एक समाजसुधारक सावित्रीबाई फुले को तो याद किया जाता है लेकिन फ़तिमा शेख़ को भुला दिया गया।

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