मुंबई की भागदौड़ में जलकर राख होने की कगार पर था आदित्य। फिर एक दिन उसने सब कुछ छोड़ दिया और निकल पड़ा पहाड़ों की ओर, उस सुकून (sukoon) की तलाश में जो शायद शहर कभी दे ही नहीं सकता था। क्या ये पलायन उसे बचाएगा या तोड़ देगा? पढ़िए बर्नआउट से जूझते एक युवा की खुद को फिर से पाने की कहानी।
भाग 1: कांच का महल
आदित्य वर्मा के लिए दुनिया मुंबई के नरीमन पॉइंट स्थित उसकी कॉर्पोरेट बिल्डिंग की 27वीं मंजिल से शुरू होकर वहीं खत्म होती थी। 31 साल का आदित्य एक टॉप मल्टीनेशनल कंसल्टिंग फर्म में सीनियर मैनेजर था। करोड़ों का पैकेज, शानदार अपार्टमेंट, तेज रफ्तार गाड़ी – बाहर से उसकी ज़िंदगी एक चमकदार सपना थी। लेकिन इस कांच के महल के अंदर, आदित्य धीरे-धीरे टूट रहा था।

रातें जागकर प्रेजेंटेशन बनाने में बीततीं, दिन क्लाइंट मीटिंग्स और डेडलाइन्स के पीछे भागते हुए। सुकून? वो शब्द उसकी डिक्शनरी से गायब हो चुका था। पेट में हमेशा एक अजीब सी ऐंठन रहती, सिर भारी रहता और सप्ताहांत आते-आते वह सिर्फ सोने और अगले हफ्ते के लिए खुद को तैयार करने लायक बचता था। दोस्तों के फोन उठाने बंद हो गए थे, माँ के वीडियो कॉल अक्सर मिस हो जाते। उसकी दुनिया सिमटकर लैपटॉप स्क्रीन, कॉफी मग और एंग्जायटी की गोलियों तक रह गई थी।
“आदित्य, ये क्वार्टरली रिपोर्ट कल सुबह इन्वेस्टर कॉल से पहले मेरे डेस्क पर चाहिए, चाहे रात के 3 क्यों न बज जाएं,” उसके बॉस, मिस्टर कपूर, की आवाज इंटरकॉम पर गूंजी। आदित्य ने थकी हुई आंखों से घड़ी देखी – रात के 11 बज चुके थे। एक और रात ऑफिस में।
उस रात, रिपोर्ट बनाते हुए, अचानक उसके सीने में तेज दर्द उठा। सांसें तेज हो गईं, कमरा घूमने लगा, पसीना छूटने लगा। उसे लगा जैसे उसका दम घुट जाएगा। ये एक पैनिक अटैक था, पहले से कहीं ज्यादा भयानक। जैसे-तैसे उसने खुद को संभाला, लेकिन उस रात कुछ बदल गया था। उसे लगा जैसे वह एक अंधी दौड़ में भाग रहा है जिसका कोई अंत नहीं, और इनाम? सिर्फ और ज़्यादा दौड़ने का मौका।
अगली सुबह, जब सूरज की पहली किरणें मुंबई के आसमान पर फैलीं, आदित्य ने एक फैसला लिया। उसने अपना इस्तीफा टाइप किया, बिना किसी लाग-लपेट के, और मिस्टर कपूर को भेज दिया। उसने अपना फोन स्विच ऑफ किया, कुछ जरूरी सामान एक बैकपैक में भरा, और टैक्सी लेकर सीधा सीएसटी स्टेशन पहुँच गया। कहाँ जाना है? उसे नहीं पता था। बस इस शहर की घुटन से दूर, कहीं बहुत दूर। ट्रेन के जनरल डिब्बे की टिकट लेकर वह किसी अनजान सफर पर निकल पड़ा।
भाग 2: सुकून की पहली आहट
कई दिनों की यात्रा और भटकने के बाद, आदित्य खुद को उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के एक छोटे, गुमनाम से गांव ‘सोनप्रयाग’ (काल्पनिक नाम) में पाया। यहां न गाड़ियों का शोर था, न मोबाइल नेटवर्क का जाल। सिर्फ पहाड़ों का मौन, हवा की सरसराहट और पक्षियों का कलरव। मुंबई की रफ्तार भरी ज़िंदगी का आदी आदित्य के लिए ये खामोशी शुरुआत में बेचैन करने वाली थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह यहां क्या करे।
उसने गांव के किनारे एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लिया। उसके मकान मालिक, 70 साल के रिटायर्ड फौजी, ज्ञान सिंह, कम बोलते थे लेकिन उनकी आंखों में एक गहरी समझ थी। गांव के लोग आदित्य को ‘शहर वाले बाबू’ कहकर बुलाते। कुछ जिज्ञासा से देखते, कुछ थोड़ी दूरी बनाए रखते।

शुरुआती दिन मुश्किल थे। आदित्य को घंटों तक कुछ करने को नहीं होता था। उसका दिमाग अब भी कॉर्पोरेट मोड में था – वह हर चीज में ‘प्रोडक्टिविटी’ ढूंढने की कोशिश करता। वह सुबह जल्दी उठता, लेकिन फिर समझ नहीं पाता कि क्या करे। उसने किताबें पढ़ने की कोशिश की, पर मन नहीं लगा। वह घंटों तक बस पहाड़ों को घूरता रहता। कभी-कभी उसे लगता कि उसने बहुत बड़ी गलती कर दी है। क्या वह सच में इस शांति के लिए बना था?
एक सुबह, ज्ञान सिंह ने उसे अपने साथ खेतों में चलने को कहा। आदित्य हिचकिचाते हुए गया। ज्ञान सिंह ने उसे फावड़ा चलाना सिखाया, बीजों के बारे में बताया, मौसम का मिजाज समझाया। पहली बार आदित्य ने अपने हाथों से मिट्टी को महसूस किया। शारीरिक मेहनत непривычна थी, शाम तक उसका बदन दर्द से टूट रहा था, लेकिन अजीब सी शांति भी थी। उस रात उसे महीनों बाद पहली बार गहरी नींद आई।
धीरे-धीरे आदित्य गांव की लय में ढलने लगा। वह सुबह ज्ञान सिंह के साथ चाय पीता, खेतों में मदद करता, गांव के बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने लगा, और शाम को नदी किनारे बैठकर डूबते सूरज को देखता। उसने सीखा कि धीमी गति से भी जीवन चल सकता है, बल्कि शायद ज्यादा खूबसूरती से। उसने सीखा कि सफलता सिर्फ पैसों या पद में नहीं, बल्कि एक शांत मन, स्वस्थ शरीर और अच्छे रिश्तों में भी है।
भाग 3: तूफान और ठहराव
बरसात का मौसम आया और पहाड़ों का एक अलग ही रूप सामने आया। एक रात, भारी बारिश के कारण गांव को शहर से जोड़ने वाला मुख्य रास्ता भूस्खलन से बंद हो गया। कई दिनों तक गांव का संपर्क कटा रहा। राशन और जरूरी सामान की कमी होने लगी।
आदित्य के अंदर का मैनेजर जागा, लेकिन इस बार उसका लक्ष्य प्रॉफिट या डेडलाइन नहीं, बल्कि लोगों की मदद करना था। उसने गांव के युवाओं के साथ मिलकर वैकल्पिक रास्ते खोजने की कोशिश की, बचे हुए राशन का हिसाब लगाया और उसे सबके बीच बराबर बांटने की व्यवस्था की। उसने अपने बचे हुए पैसों से कुछ जरूरी दवाइयां मंगवाने के लिए पास के कस्बे तक जाने वाले एक कठिन पहाड़ी रास्ते से जाने का जोखिम उठाया।

इस मुश्किल घड़ी में, उसने गांव वालों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। उसने देखा कि कैसे कम संसाधनों में भी लोग एक-दूसरे का सहारा बनते हैं। उसने उस एकजुटता और अपनेपन को महसूस किया जो उसने अपने मुंबई के फ्लैट में कभी महसूस नहीं किया था। जब रास्ता साफ हुआ और स्थिति सामान्य हुई, तो गांव वालों की आंखों में आदित्य के लिए सम्मान और अपनापन था। उसे अब ‘शहर वाला बाबू’ नहीं, बल्कि ‘अपना आदित्य भाई’ कहा जाने लगा था।
इस घटना ने आदित्य को अंदर तक बदल दिया। उसे पहली बार लगा कि उसकी ज़िंदगी का कोई मतलब है, जो सिर्फ उसकी अपनी सफलता तक सीमित नहीं है। उसने महसूस किया कि असली सुकून बाहरी परिस्थितियों से ज़्यादा मन की अवस्था है। उसने पहाड़ों से सीखा था – शांत रहना, स्थिर रहना, और हर मौसम का सामना करना।
भाग 4: नई सुबह
महीने बीत गए। आदित्य का मुंबई वाला रूप अब धुंधला पड़ चुका था। उसकी जगह एक शांत, सुलझे हुए इंसान ने ले ली थी, जिसकी आंखों में अब डेडलाइन का खौफ नहीं, बल्कि पहाड़ों की गहराई थी।
एक दिन उसके पुराने बॉस, मिस्टर कपूर का फोन आया (नेटवर्क कभी-कभी आ जाता था)। उन्होंने आदित्य को एक शानदार ऑफर दिया – बेहतर पोजिशन, ज्यादा सैलरी। “मुंबई वापस आ जाओ, आदित्य,” उन्होंने कहा, “ये पहाड़ों में क्या रखा है?”
आदित्य ने फोन पर दूर दिखती बर्फीली चोटियों को देखा, हवा में घुली मिट्टी और चीड़ की खुशबू महसूस की, ज्ञान सिंह की मुस्कान याद की। उसने विनम्रता से मिस्टर कपूर का ऑफर ठुकरा दिया।
“धन्यवाद सर,” उसने कहा, “लेकिन मुझे मेरा सुकून मिल गया है।”
आदित्य जानता था कि उसकी यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है। शायद वह हमेशा के लिए सोनप्रयाग में न रहे। शायद वह कोई ऐसा रास्ता निकाले जिससे वह तकनीक का इस्तेमाल करके यहीं से कुछ काम कर सके, या गांव के विकास में मदद कर सके। शायद वह कभी-कभी मुंबई जाए, लेकिन अब वह उस शहर की अंधी दौड़ का हिस्सा नहीं बनेगा।

उस सुबह, जब सूरज की पहली किरणें नंदा देवी की चोटी पर पड़ीं, आदित्य ने गहरी सांस ली। उसने शहर छोड़ा था, लेकिन पाया खुद को था। उसने नौकरी छोड़ी थी, लेकिन जीवन को गले लगाया था। सुकून सिर्फ एक जगह नहीं थी, वह एक एहसास था जो अब उसके अंदर था। पहाड़ों ने उसे सिर्फ बचाया नहीं था, उन्होंने उसे जीना सिखा दिया था।
आपको क्या लगता है असली सुकून कहाँ पर शहरों की भागती दौड़ती ज़िन्दगी में या गाओं और पहाड़ों की सादगी भरी ज़िन्दगी में। अपना जवाब हमें कमेंट में बताएं
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